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Home लाइफस्टाइल

जब भूख ने शब्दों का स्वर धारण किया, तब जन्मा युग-ग्रंथ

AT हिंदी डेस्क by AT हिंदी डेस्क
September 10, 2026
in लाइफस्टाइल
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जब भूख ने शब्दों का स्वर धारण किया, तब जन्मा युग-ग्रंथ
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“मैं भूख हूँ“

विश्व का प्रथम त्रि–आयामी गीत–महाग्रंथ

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(गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज)

हर युग की अपनी एक भूख होती है। कभी वह रोटी की होती है, कभी न्याय की; कभी सम्मान की, कभी मनुष्यता की। सभ्यताएँ बदलती रहती हैं, किन्तु मनुष्य की यह भूख उसके साथ चलती रहती है। साहित्य का धर्म इसी अदृश्य भूख को शब्द देना है। “मैं भूख हूँ” उसी शाश्वत मानवीय प्रश्न का एक युग-ग्रंथ है।

यह केवल गीतों का संग्रह नहीं, न ही कविताओं का साधारण संकलन। यह उस भूख की महागाथा है, जो किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि समूचे समाज, समूचे राष्ट्र और समूची मानवता की साझा अनुभूति है। यह भूख कभी रोटी की है, कभी सम्मान की; कभी न्याय की है, कभी प्रेम की; कभी अवसर की है, तो कभी आत्मसम्मान की। यही कारण है कि इस महाग्रंथ में “भूख” किसी विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत महा-नायिका के रूप में उपस्थित होती है।

प्रख्यात गीतकार, कवि, साहित्यकार एवं शिक्षाविद् डॉ. अवनीश राही की यह नवीनतम कृति हिंदी साहित्य में एक नए अध्याय का उद्घाटन करती है। चार दशकों से अधिक समय की सतत साहित्य-साधना, जनजीवन के निकट अनुभव और मानवीय संवेदनाओं की गहरी समझ इस महाग्रंथ के प्रत्येक पृष्ठ पर स्पंदित होती है। यह पुस्तक किसी कल्पना का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन की धूप, धूल, आँसू, संघर्ष, श्रम और आशा में तपकर निकली चार दशकों से अधिक की साहित्य-साधना का सार है।

इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसका त्रि-आयामी स्वरूप है। इसे केवल पढ़ा ही नहीं जा सकता, बल्कि प्रत्येक रचना को क्यूआर कोड के माध्यम से सुना और देखा भी जा सकता है। इस प्रकार साहित्य पहली बार पठनीय, श्रवणीय और दर्शनीय—तीनों रूपों में एक साथ पाठक के सामने उपस्थित होता है। यही अभिनव प्रयोग इसे विश्व के प्रथम त्रि-आयामी गीत-महाग्रंथ के रूप में विशिष्ट पहचान प्रदान करता है, जिसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त हुई है।

किन्तु इस कृति की वास्तविक शक्ति किसी विश्व रिकॉर्ड में नहीं, बल्कि उस विचार में निहित है, जो पाठक को स्वयं से प्रश्न करने के लिए विवश करता है।

आज जब विकास के अनेक दावों के बीच करोड़ों लोगों के जीवन में भूख अनेक रूपों में उपस्थित है, तब “मैं भूख हूँ” पाठक से एक असहज किन्तु आवश्यक प्रश्न पूछती है—क्या भूख केवल पेट की होती है? यदि नहीं, तो क्या सम्मान की भूख, न्याय की भूख, प्रेम की भूख, शिक्षा की भूख और समान अवसर की भूख भी उतनी ही वास्तविक नहीं है?

यही प्रश्न इस महाग्रंथ को सामान्य साहित्य से अलग खड़ा करते हैं। इसकी प्रत्येक रचना पाठक को उत्तर नहीं देती; वह उसे सोचने, महसूस करने और स्वयं से संवाद करने के लिए प्रेरित करती है।

डॉ. अवनीश राही ने भूख को केवल करुणा का प्रतीक नहीं बनाया, बल्कि उसे संघर्ष का स्वर, श्रम का सम्मान, संवेदना की कसौटी और राष्ट्र-निर्माण का मूल प्रश्न बना दिया है। उनके लिए राष्ट्र केवल सीमाओं का भूगोल नहीं, बल्कि मनुष्यता की जीवंत चेतना है। वह किसान की हथेली में अंकुरित होता है, मजदूर के पसीने में आकार लेता है, माँ की थाली में संस्कार बनता है और युवा के सपनों में अपना भविष्य गढ़ता है। इसलिए “मैं भूख हूँ” केवल भूख की कथा नहीं कहती, बल्कि उस राष्ट्र की अंतरात्मा को स्वर देती है, जिसकी वास्तविक शक्ति उसके लोगों की गरिमा, संवेदना, श्रम और सम्मान में निहित होती है।

इसी कारण यह महाग्रंथ केवल साहित्यिक आनंद नहीं देता, बल्कि सामाजिक चेतना को भी झकझोरता है। इसकी भाषा सरल होते हुए भी गंभीर है और उसका प्रभाव तत्काल नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पाठक के भीतर उतरता है। यह पाठक को उत्तर नहीं थमाता, बल्कि उसे अपने समय, अपने समाज और अपने उत्तरदायित्व से संवाद करने की प्रेरणा देता है।

समकालीन हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में “मैं भूख हूँ” उन विरल कृतियों में अपना विशिष्ट स्थान रखती है, जो कविता को जीवन से और जीवन को राष्ट्र की व्यापक संवेदना से जोड़ती हैं। यह पुस्तक किसी विचारधारा का घोषणापत्र नहीं, बल्कि मनुष्यता के पक्ष में खड़ा एक साहित्यिक दस्तावेज़ है।

डॉ. अवनीश राही का साहित्य सदैव मनुष्य की गरिमा, श्रम की प्रतिष्ठा और संवेदना की शक्ति का पक्षधर रहा है। उनकी रचनाओं में शब्द केवल अलंकार नहीं बनते, बल्कि समाज के मौन वर्गों की आवाज़ बनकर उभरते हैं। “मैं भूख हूँ” उसी दीर्घ साहित्यिक यात्रा का परिपक्व और ऊर्जस्वित शिखर है।

यह महाग्रंथ हमें यह भी स्मरण कराता है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल उसकी ऊँची इमारतों, विस्तृत सड़कों या आर्थिक आँकड़ों से नहीं मापी जा सकती। किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वहाँ कितने चेहरे सम्मानपूर्वक मुस्कुरा पा रहे हैं और कितनी थालियाँ बिना भय और अभाव के भर पा रही हैं।

इसीलिए “मैं भूख हूँ” केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि अनुभव करने की कृति; केवल साहित्य नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर; केवल गीत नहीं, बल्कि समय की धड़कनों का दस्तावेज़ है।

डॉ. अवनीश राही अपने इस महाग्रंथ के भाव को अत्यंत संक्षेप में इन शब्दों में व्यक्त करते हैं—

“जहाँ भूख है—वहाँ मैं हूँ।

जहाँ मैं हूँ—वहाँ सुलगते प्रश्न हैं।”

— डॉ. अवनीश राही

आज जब साहित्य से केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के बीच नए संवाद की अपेक्षा की जा रही है, तब “मैं भूख हूँ” एक ऐसे महाग्रंथ के रूप में सामने आती है, जो शब्दों को संवेदना से, संवेदना को विचार से और विचार को राष्ट्र की आत्मा से जोड़ने का साहस रखती है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि हमारे समय की अंतरात्मा से किया गया एक गंभीर, मानवीय और साहित्यिक संवाद है। संभवतः इसी कारण “मैं भूख हूँ” अपने पाठकों से केवल पढ़े जाने का आग्रह नहीं करती, बल्कि महसूस किए जाने की अपेक्षा रखती है। यही इस महाग्रंथ की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह पाठक को शब्दों से आगे ले जाकर संवेदना के उस धरातल पर खड़ा कर देती है, जहाँ प्रश्न केवल पढ़े नहीं जाते—जीए जाते हैं, और उत्तर केवल खोजे नहीं जाते—मनुष्य के भीतर जन्म लेते हैं।

पुस्तक–परिचय

  • कृति : मैं भूख हूँ (एक युग-काव्य-संहिता)
  • रचनाकार : डॉ. अवनीश राही
  • प्रकाशक : नुवॉइस प्रकाशन
  • विशिष्ट वितरण : पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया
  • विशेषता : विश्व का प्रथम त्रि-आयामी गीत-महाग्रंथ
  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज
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