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भारत के अटॉर्नी जनरल ने समय पर न्याय सुनिश्चित करने पर आयोजित सेमिनार में प्ली बार्गेनिंग के लिए नए ढांचे की मांग की

AT हिंदी डेस्क by AT हिंदी डेस्क
March 16, 2026
in क्षेत्रीय
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भारत के अटॉर्नी जनरल ने समय पर न्याय सुनिश्चित करने पर आयोजित सेमिनार में प्ली बार्गेनिंग के लिए नए ढांचे की मांग की
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नई दिल्ली, 16 मार्च 2026: भारत के अटॉर्नी जनरल श्री आर. वेंकटरमणि ने प्ली बार्गेनिंग के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सिद्धांतों व व्यवहारों पर आधारित एक नए ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया। यह बात उन्होंने “Delivering Justice in Time: Global Practices and Indian Experiences” विषय पर आयोजित सेमिनार के उद्घाटन सत्र में कही, जिसे ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।

उन्होंने कहा, “प्ली बार्गेनिंग अब वैश्विक स्तर पर स्वीकार की जा रही है। इसके लिए एक राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की आवश्यकता है, जो एक स्वस्थ और पारदर्शी तरीके से अधिवक्ताओं तथा न्याय के इच्छुक पीड़ितों को मार्गदर्शन और सलाह दे सके। कानूनी और नागरिक प्राधिकरणों को इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भी इस विषय पर एक मजबूत आंतरिक चर्चा के लिए सहमति दी है। मौजूदा कानूनी तंत्र को भी नए दृष्टिकोण से तैयार किया जाएगा, जिसमें बचाव पक्ष के लिए रियायत और राज्य के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दिया जाएगा।”

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उन्होंने आगे कहा कि राज्य के संसाधनों का प्रबंधन केवल प्ली बार्गेनिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय प्रशासन की पूरी व्यवस्था में एक आर्थिक सिद्धांत की तरह लागू होना चाहिए। “इसी कारण मैं ‘नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर क्रिमिनल जस्टिस एडमिनिस्ट्रेशन’ की स्थापना के बारे में सोच रहा हूँ, जहाँ एक दैनिक सूचकांक के माध्यम से प्रदर्शन और माप का आकलन किया जा सके। जो लोग ट्रायल कोर्ट में काम करते हैं, वे जानते हैं कि लोगों, सरकार, संस्थानों, वकीलों और न्यायाधीशों के संसाधनों और समय की बर्बादी कितनी पीड़ादायक होती है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए “लीगल हेल्थ इंडेक्स” अत्यंत महत्वपूर्ण है। “यह इंडेक्स न्याय तक पहुँच की सरलता, निवारक और पूर्वानुमेय प्रक्रियाओं, तथा विभिन्न हितधारकों की भूमिकाओं और आवश्यक संसाधनों का आकलन करेगा। इसे सही तरीके से विकसित और लागू किया जाना चाहिए। मेरा मानना है कि इसे केवल शासन संस्थाओं के हाथ में होना आवश्यक नहीं है; कानून के स्कूल और विश्वविद्यालय भी इसके निर्माण और संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। समाज को भी बौद्धिक रूप से इसमें भागीदारी करनी चाहिए और नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करने चाहिए,” उन्होंने जोड़ा।

अपने मुख्य वक्तव्य में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद डॉ. अभिषेक एम. सिंहवी ने भारत में मामलों के भारी लंबित होने की समस्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “यह भारत की न्याय प्रणाली का विरोधाभास है कि एक ओर यह विश्व की सबसे उन्नत न्यायिक व्याख्याएँ प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर मामलों के भारी बैकलॉग से जूझ रही है।”

उन्होंने कहा कि हमें ‘ABCD’-Access (पहुँच), Backlog (लंबित मामले), Cost (लागत) और Delay (विलंब)—की समस्याओं का समाधान करना होगा। इसके लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायिक रिक्तियों को भरना, बहु-स्तरीय केस मैनेजमेंट प्रणाली अपनाना, बहुत पुराने मामलों के समाधान के लिए विशेष तंत्र बनाना, मध्यस्थता को मजबूत करना, ग्राम न्यायालयों को पुनर्जीवित करना तथा अदालतों, पुलिस और जेलों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि लंबित मामलों की समस्या के समाधान के लिए एक समग्र और समन्वित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। “हमें उपचारात्मक और निवारक दोनों दृष्टिकोण अपनाने होंगे और इस समस्या के समाधान के लिए नए और साहसिक तरीकों को अपनाना होगा। दूसरी ओर, मध्यस्थता (Arbitration) की व्यवस्था भी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है, क्योंकि यह प्री-लिटिगेशन लिटिगेशन बन गई है और प्रक्रिया में एक और चरण जोड़ रही है। इसके अलावा प्रशिक्षित मध्यस्थों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है,” उन्होंने कहा। उन्होंने उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु में अंतर पर पुनर्विचार की भी बात कही और सुधारों के दीर्घकालिक और निरंतर क्रियान्वयन पर जोर दिया।

अपने स्वागत भाषण में ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रो. (डॉ.) सी. राज कुमार ने कहा कि कानून का शासन केवल संवैधानिक संरचना या कानूनी सिद्धांतों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि संस्थाएँ समयबद्ध, निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से न्याय प्रदान कर पाती हैं या नहीं।

उन्होंने भारत में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों की गंभीर स्थिति पर ध्यान आकर्षित करते हुए न्याय प्रणाली में सुधार के लिए पाँच प्रमुख स्तंभों का प्रस्ताव रखा:

  1. न्यायिक क्षमता को मजबूत करना
  2. प्रक्रियात्मक सुधार और सक्रिय केस प्रबंधन
  3. अदालतों में प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग
  4. प्ली बार्गेनिंग और प्री-ट्रायल तंत्र का विस्तार
  5. डेटा-आधारित न्याय प्रशासन

डॉ. राज कुमार ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल और ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के बीच सहयोग की सराहना की। उन्होंने इस सेमिनार को देश के विभिन्न शहरों और राज्यों में आयोजित चर्चाओं की एक श्रृंखला में विस्तार देने की भी इच्छा व्यक्त की, ताकि भारत में समय पर और प्रभावी न्याय की आवश्यकता के प्रति सामूहिक जागरूकता और गति उत्पन्न की जा सके।

कानून और न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल की ओर से भी एक संदेश साझा किया गया, जो आधिकारिक दायित्वों के कारण कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। उन्होंने सेमिनार के परिणामों में गहरी रुचि व्यक्त की और कहा गया कि विचार-विमर्श की एक विस्तृत रिपोर्ट उन्हें आगे की चर्चा के लिए भेजी जाएगी।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के कुलपति प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी ने अपने संबोधन में सेमिनार के विषय “Justice in Time” के गहरे अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि केवल गति ही न्याय नहीं होती; न्याय प्रणाली की वास्तविक वैधता निष्पक्षता, पारदर्शिता और प्रक्रियात्मक ईमानदारी पर निर्भर करती है। उन्होंने भारत के नए आपराधिक कानूनों में निर्धारित समय-सीमाओं का अनुभवजन्य मूल्यांकन करने, पीड़ित न्याय तंत्र को मजबूत करने, प्रारंभिक चरण से निरंतर कानूनी सहायता प्रदान करने और एक समग्र राष्ट्रीय सजा नीति विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यक्रम के अंतर्गत पूरे दिन कई सत्र आयोजित किए गए, जिनमें प्रमुख विषय शामिल थे:

  • संस्थागत और प्रक्रियात्मक सुधार: न्यायालय प्रणाली में दक्षता में सुधार
  • प्रौद्योगिकी और समय पर न्याय: डिजिटल अदालतें, एआई और डेटा शासन
  • प्ली बार्गेनिंग और प्री-ट्रायल तंत्र: न्याय से समझौता किए बिना दक्षता

इन सत्रों में वरिष्ठ वकीलों, विधि विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने भाग लिया। प्रमुख प्रतिभागियों में डॉ. पिंकी आनंद, श्री तनवीर अहमद मीर, श्री संजीव सेन और श्री मनींदर सिंह (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता) शामिल थे। इनके साथ जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. शिरीन मोटी और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गरिमा तिवारी ने भी भाग लिया।

अन्य सत्रों में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अपराजिता भट्ट, वीटोएआई टेक्नोलॉजीज़ भारत लिमिटेड के संस्थापक और सीईओ श्री आर्यन ग्रोवर, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के सायरिल श्रॉफ सेंटर फॉर एआई, लॉ एंड रेगुलेशन की सहायक निदेशक प्रो. पावनी जैन, सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री गीता लूथरा तथा अदालत एआई के चीफ लीगल ऑफिसर श्री पार्थ मनिकतला शामिल थे।

अंतिम सत्र में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के कुलपति प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी ने मुख्य भाषण दिया। अन्य वक्ताओं में सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता सुश्री वृंदा भंडारी, जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. वैभव चड्ढा, प्रो. (डॉ.) खगेश गौतम और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सात्विक वर्मा शामिल थे। इस सत्र का संचालन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली की अकादमिक फेलो सुश्री प्रियंशी सिंह ने किया।

कार्यक्रम की प्रारंभिक टिप्पणी जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की सहायक प्रोफेसर प्रो. अपर्णा बाबू जॉर्ज ने दी, जबकि धन्यवाद ज्ञापन ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार प्रो. दबीरु श्रीधर पटनायक ने प्रस्तुत किया।

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